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भारत को मिली अस्थायी राहत, रूस से तेल खरीदने पर भारी अमेरिकी टैरिफ लगाने से पहले होगी समीक्षा

नई दिल्ली
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट (ग्राहम एक्ट) के कुछ खास प्रावधानों को अस्थायी रूप से हटा दिया है। इस फैसले से भारत और चीन समेत उन देशों पर 100 प्रतिशत तक के अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी फिलहाल रुक गई है, जो रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि प्रशासन बड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभावों का अध्ययन करने के लिए 60 दिन का समय ले रहा है, ताकि आगे के कदम सोच-समझकर तय किए जा सकें।

दरअसल, सितंबर में अमेरिकी कांग्रेस में दोनों दलों के भारी बहुमत से पास हुए इस कानून के अनुसार, 18 अक्टूबर से रूस के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े आयातक देशों के सामान पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता था, अगर वे जानबूझकर नई खरीदारी जारी रखते। भारत इस सूची में प्रमुख रूप से शामिल था। ट्रंप प्रशासन ने कार्यकारी आदेश के जरिए इसे 60 दिन की समीक्षा अवधि के रूप में तय किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हस्ताक्षरित आदेश में साफ लिखा है कि यह छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री यह तय नहीं कर लेते कि आगे कार्रवाई की जरूरत है। इसमें कोई स्वचालित समाप्ति तारीख तय नहीं की गई है।

छूट के पीछे के कारण
इस अस्थायी राहत का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को अस्थिर होने से बचाना है। दुनिया भर में कई संकट एक साथ चल रहे हैं। ईरान से जुड़े तनाव और अस्थिरता, सऊदी अरब को निशाना बनाकर हो रहे हूती हमले तथा रूस-यूक्रेन युद्ध अभी भी जारी है। इन परिस्थितियों में अगर अचानक रूसी तेल पर सख्त रोक लगा दी जाती, तो वैश्विक ईंधन आपूर्ति में बड़े पैमाने पर कमी आ सकती थी और कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि पहले इन प्रभावों का पूरा आकलन जरूरी है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जो सोमवार को भारत आने वाले हैं, ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि भारत ने अपनी मर्जी से अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है। लेकिन सप्लायर बदलने का काम 'एक दिन से दूसरे दिन' नहीं हो सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साथी और साझेदार बना हुआ है और दोनों देशों के रिश्ते मजबूत हैं।

भारत के लिए तुरंत फायदे
इस छूट से भारत को कई मोर्चों पर राहत मिली है। सबसे बड़ा लाभ यह है कि नए कानून के तहत लगने वाले भारी अतिरिक्त टैरिफ और व्यापार प्रतिबंधों से कुछ समय के लिए बचाव हो गया है। ये प्रतिबंध डेडलाइन से ठीक पहले लागू होने वाले थे। भारतीय रिफाइनरियों को फिलहाल रियायती रूसी तेल खरीदने की सुविधा जारी रह सकती है। रुबियो ने स्वीकार किया कि भारत अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो को अलग-अलग स्रोतों से भरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घरेलू अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाले बिना वह रातों-रात रूसी कच्चे तेल से पूरी तरह दूर नहीं हो सकता। इस अस्थायी छूट से रिफाइनरियों को अपनी मौजूदा आपूर्ति व्यवस्था बनाए रखने का मौका मिला है, जिससे घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों पर अचानक दबाव नहीं पड़ेगा। वैश्विक ऊर्जा बाजार की वास्तविकता को देखते हुए यह फैसला महत्वपूर्ण है। अचानक आपूर्ति में रुकावट आने से ईंधन की कीमतें बढ़ने का खतरा बना रहता है, जिसका असर भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता था।

फैसले का अमेरिका में विरोध
हैरान करने वाली बात ये है कि ट्रंप के इस फैसले को वाशिंगटन में ही विरोध होने लगा है। दोनों राजनीतिक दलों के कई सांसदों ने छूट को गलत बताया है। उनका कहना है कि आर्थिक दबाव कम करने से मॉस्को की सैन्य फंडिंग रोकने की पश्चिमी कोशिशें कमजोर हो जाएंगी। मैसाचुसेट्स की डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने ट्रंप पर सीधे आरोप लगाया कि उन्होंने कांग्रेस की मंशा को नजरअंदाज किया है और रूसी हमले को बढ़ावा देने का काम किया है। उन्होंने सांसदों से इस फैसले को बदलने की अपील की। दूसरी ओर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि पाबंदियों में ढील देने से सीधे तौर पर रूस को फायदा होगा और यूक्रेन पर दबाव और बढ़ेगा।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) और अन्य व्यापार विश्लेषकों ने साफ चेतावनी दी है कि यह कोई स्थायी नीति बदलाव नहीं है। यह केवल अस्थायी और वापस ली जा सकने वाली राहत है। 60 दिन की समीक्षा अवधि खत्म होने के बाद भी नई दिल्ली को नीति संबंधी अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिकी प्रशासन के पास किसी भी समय सस्पेंड किए गए टैरिफ को बहाल करने या और सख्त करने का पूरा अधिकार है।

यह कदम रुबियो के भारत दौरे और उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठकों से ठीक पहले उठाया गया है। इससे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत पर असर पड़ सकता है। दोनों पक्ष फिलहाल इस छूट को सकारात्मक मान सकते हैं, लेकिन लंबी अवधि में ऊर्जा आयात को लेकर भारत को और विविधता लाने की तैयारी रखनी होगी।

इस फैसले से एक बात साफ है कि भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह कार्यकारी आदेश फिलहाल बिना टैरिफ के रियायती रूसी तेल आयात करने की अस्थायी सुविधा देता है। दूसरी ओर जानकारों का कहना है कि लंबी अवधि की कोई गारंटी नहीं है और ऊर्जा आयातकों को नीति संबंधी अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।

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